भगत सिंह: बचपन में ही जला दी थी सरकारी स्कूल की पुस्तकें और कपड़े

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श्रद्धा उपाध्याय। वीर स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को कौन नहीं जानता जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों को बलिदान कर दिया। देश की स्वतंत्रता में अनेकों वीर सपूतों के साथ एक नाम शहीद भगत सिंह का भी है‍‌‌। इनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था , जो अब पाकिस्तान में है। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। इनका जन्म एक सिख परिवार में हुआ था जबकि इनका पूर्णत: परिवार आर्य- समाजी था। इस तरह इनका परिवार आर्य समाजी सिख परिवार था। भगत सिंह करतार सिंह, साराभा और लाला लाजपत राय से अत्यधिक प्रभावित रहे। भगत सिंह पर इन दोनों का गहरा प्रभाव पड़ा इसलिए ये बचपन से ही अंग्रेजों से घृणा करने लगे थे ।

14 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने सरकारी स्कूल की पुस्तके और कपड़े जला दिए, इसके बाद इनके पोस्टर गावों में छपने लगे। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर गहरा प्रभाव डाला। लाहौर के नेशनल कॉलेज की पदाई छोड़ कर महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए. अहिंसा आन्दोलन में भाग लेने लगे, जिसमे गाँधी जी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर रहें थे। केवल 23 साल की उम्र में इन्होने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। भारत की आज़ादी की लड़ाई के समय भगत सिंह नौजवानों के लिए यूथ आइकॉन थे, जो उन्हें देश को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उनकी सोच थी, कि देश के नौजवान देश की काया पलट सकते हैं . इसलिए उन्होंने सभी नौजवानों को एक नई दिशा दिखने की कोशिश की।

देशप्रेम में भगत सिंह ने अपनी कॉलेज की पढाई छोड़ दी और आज़ादी की लड़ाई में कूद गए। इसी दौरान उनके घर वाले उनकी शादी का विचार कर रहे थें । इन्होंने शादी से इनकार कर दिया और कहा अगर आज़ादी से पहले मई शादी करूँ तो मेरी दुल्हन की मौत होगी।
भगत सिंह स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ -साथ अछे एक्टर भी थे। इन्हें लिखने का भी बहुत शौक था .

भगत सिंह पहले महात्मा गाँधी द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन और नेशनल कांफ्रेश के सदस्य थे । 1921 में चौरी-चौरा हत्याकांड के बाद गांधीजी ने किसानों का साथ नहीं दिया तो भगत सिंह पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद यह चंद्रशेखर के नेतृत्वा में गठित ग़दर दल का हिस्सा बन गए।

चंद्रशेखर आज़ाद के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ आन्दोलन शुरू किया और अगस्त 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ के लिए चली 8 नंबर डाउन पैसेंजर काकोरी नामक छोटे से स्टेशन पर सरकारी, खजाने को लूट लिया। यह घटना काकोरी कांड नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है। इस घटना को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और प्रमुख क्रन्तिकारियों ने मिलकर अंजाम दिया था।


क्रन्तिकारी साथी बटकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने डेल्ही स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेन्ट्रल असेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज सरकार को जगाने के लिए पर्चे फेंके थे। जेल में भगत सिंह करीब 2 साल रहे । इस दौरान लेख लिखकर अपने क्रन्तिकारी विचार व्यक्त करते थे । उन्होंने जेल में एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों’ हैं। जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिन तक भूख हड़ताल की। उनके एक साथी ने भूख हड़ताल के दौरान ही अपने प्राण त्याग दिए।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। तीनों ने हस्ते-हस्ते देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। पाकिस्तान में शाहीद भगत सिंह के नाम पर चौराहे का नाम रखे जाने पर खूब बवाल मचा था । इससे लाहौर प्रशासन ने ऐलान किया किया था कि मशहूर शास्मन चौक का नाम बदलकर भगत सिंह चौक किया जाएगा। संसद में बम फेकने के बाद इन पर जो आरोप थे उनके हिसाब से इन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी, लेकिन ऊपर सांडर्स को भागने के आरोपों को सही पाया गया जिसकी वजह से इन्हें फांसी की सजा दी गयी।

फांसी के बाद अंग्रेज अधिकारीयों ने सोचा की लोग भड़क न जाए इसके डर से उन्होंने भगत सिंह के शारीर के टुकड़े कर दिए और बोरियों में भरकर फिरोजपुर की तरफ ले गए और मिट्टी के तेल से जलाने की कोशिश की, इसी बीच लोगों को इस बारे में पता चला तो वह बीच में छोड़कर सतलुज नदी में फेंककर भाग गए . इसके बाद लोगों ने इनके शरीर से अवशेष निकलकर विधि विधान से अंतिम संस्कार किया। जब इन्हें फांसी दी जा रही थी तब महेता ने इनसे पूछा क्या आप देश को कोई सन्देश देना चाहेंगे भगत सिंह ने कहा सिर्फ दो संदेश – “समाजवाद मुर्दाबाद और इंक़लाब जिंदाबाद”


भगत सिंह एक अच्छे वक्ता पाठक व लेखक भी थे। उन्होंने अनेको पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उनका कहना था देश का युवा देश का हुलिया बदल सकता है और देश को आज़ाद भी करा सकता है। जो उन्होंने स्वयं करके भी दिखाया, और एक महान और सच्चे देशभक्त बने ।इनका जीवन जीवन संघर्ष से परिपूर्ण था . आज भी भारत और पाकिस्तान की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है . जिसने अपनी जवानी सहित सारी ज़िन्दगी देश के लिए समर्पित कर दी।

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